मुग़ल शासकों पर जारी तर्क-वितर्क के बीच भारत के सबसे प्रबुद्ध विचारकों में से एक, दारा शिकोह को याद करना आज के समय में प्रासंगिक है — जो धर्मों और संस्कृतियों के सौहार्दपूर्ण सह-अस्तित्व के समर्थक थे। वे अंतरधार्मिक समझ के अग्रदूत, दार्शनिक, कलाकार, वास्तुकार, अनुवादक, कवि और प्रशासक थे।
उत्तराधिकारी से विचारक तक
वर्ष 1655 में, उनके पिता और मुग़ल सम्राट शाहजहाँ ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था, परन्तु 30 अगस्त 1659 को 44 वर्ष की आयु में उनके छोटे भाई औरंगज़ेब ने सत्ता संघर्ष में उनकी हत्या कर दी। यद्यपि वे औरंगज़ेब से युद्ध हार गए, परंतु भारत के लिए वे विचारों की जंग जीत गए, और आज हम उस जीत का उत्सव एक ऐसे गौरवशाली राष्ट्र के रूप में मना रहे हैं, जो ‘विविधता में एकता’ का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है।
दारा शिकोह को अधिक सैन्य अनुभव नहीं था क्योंकि शाहजहाँ ने उन्हें दरबार में ही रखा था, फिर भी उन्होंने दारा अपने अन्य पुत्रों की अपेक्षा अपना उत्तराधिकारी चुना, जिन्हें विभिन्न राज्यों का गवर्नर बना कर भेजा गया था। शाहजहाँ यह भली-भांति जानते थे कि भारत की गहराई तक जमी आध्यात्मिक जड़ों के कारण उसे केवल बल प्रयोग से नहीं, बल्कि शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व, सहिष्णुता और लोगों के दिल जीत कर ही चलाया जा सकता है। यही वे मूल्य हैं जो किसी देश की जनता को एक सूत्र में बाँधते हैं। यदि दारा शिकोह सत्ता संघर्ष में औरंगज़ेब पर विजय प्राप्त करते, तो भारतीय उपमहाद्वीप का इतिहास कैसा होता, इस पर सदियों से विचार-विमर्श होता रहा है। भले ही वे सम्राट नहीं बन पाए, परंतु भारतीय सभ्यता पर उनके प्रभाव किसी सम्राट से कम नहीं हैं।
अंतरधार्मिक संवाद के अग्रदूत
इस्लाम और हिन्दू धर्म सहित विभिन्न धर्मों की गहरी समझ रखने वाले दारा शिकोह भारत में अंतरधार्मिक समझ के अकादमिक आंदोलन के अग्रणी माने जाते हैं। उन्होंने इस्लाम और हिन्दू धर्म के बीच समानताओं की खोज कर दोनों की संस्कृतियों बीच संवाद की शुरुआत की। उनकी प्रमुख कृतियाँ मज्मा-उल-बहरीन (दो सागरों का संगम) और सिर्र-ए-अकबर (महान रहस्य) इन दोनों धर्मों के बीच संबंध स्थापित करने के उद्देश्य से लिखी गई थीं। उन्होंने न केवल समानताएँ बताईं, बल्कि यह भी कहा कि इन दोनों की बुनियाद एक ही है — “एक ही परम सत्य और एक ही ईश्वर में विश्वास।” उनका दृष्टिकोण समावेशी था और वे भारत की मिश्रित संस्कृति को समझते थे।
भाषा, संस्कृति और अनुवाद कार्य
संस्कृत और फ़ारसी भाषाओं में दारा शिकोह की दक्षता ने भारतीय संस्कृति और हिन्दू धार्मिक चिंतन को लोकप्रिय बनाने में उनकी सहायता की। उन्होंने उपनिषदों और अन्य महत्वपूर्ण हिन्दू ग्रंथों का संस्कृत से फ़ारसी में अनुवाद किया। इन अनुवादों के माध्यम से उन्होंने हिन्दू संस्कृति और आध्यात्मिकता को यूरोप और पश्चिमी दुनिया तक पहुँचाया। उस समय यूरोपीय लोग संस्कृत नहीं पढ़ते थे, लेकिन वे फ़ारसी पढ़ सकते थे, इसलिए उन्होंने दारा शिकोह द्वारा अनुवादित फ़ारसी ग्रंथों को पढ़ा, जिनका बाद में लैटिन में अनुवाद किया गया। इस प्रकार भारत के धार्मिक और सांस्कृतिक ग्रंथों के अध्ययन का एक नया आंदोलन शुरू हुआ। इसके बाद यूरोपीयों ने संस्कृत का अध्ययन भी आरंभ किया। इस तरह, भारत की संस्कृति को उपमहाद्वीप से बाहर फैलाने का श्रेय दारा शिकोह के अग्रदूत कार्य को जाता है। आगे चलकर, दार्शनिक जगत में उपनिषदों की प्रशंसा करना एक परंपरा बन गई। यह उनका भारतीय बौद्धिक और धार्मिक विरासत में महानतम योगदान है।
कला और स्थापत्य में योगदान
साथ ही ललित कला और वास्तुकला में भी दारा शिकोह की गहरी रुचि थी। उन्होंने अपनी पत्नी को समर्पित एक अल्बम तैयार किया, जो भारतीय कला का अमूल्य धरोहर है। एक दुर्लभ लघुचित्र जिसमें वे अपने आध्यात्मिक गुरुओं के साथ दिखाई देते हैं, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के पुस्तकालय में संरक्षित है। एक कुशल वास्तुकार के रूप में, उन्होंने श्रीनगर में सुन्दर परी महल गार्डन पैलेस और अन्य कई स्मारकों की डिज़ाइन तैयार की।
दारा शिकोह की विरासत का पुनरुद्धार
हमारे बहुधार्मिक और विविधतापूर्ण समाज में अंतरधार्मिक संवाद की महत्ता को कम करके नहीं आंका जा सकता। आज जब भारत एक वैश्विक सांस्कृतिक शक्ति बनने की ओर अग्रसर है, दारा शिकोह की विरासत और अधिक प्रासंगिक हो जाती है।
वर्ष 2020 में एएमयू के शताब्दी समारोह में भाषण देते हुए भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने एक सच्चे राजनेता के रूप में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय को भारत की संयुक्त संस्कृति का प्रतीक बताया और उसे ‘मिनी इंडिया’ की संज्ञा दी। उन्होंने विश्वविद्यालय से भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के अध्ययन और शोध का आह्वान किया ताकि भारत के सांस्कृतिक संबंधों को नई ऊर्जा मिल सके।
समुदायों को साथ लाकर सहिष्णुता और राष्ट्रीय एकता की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए, एएमयू ने अपने शताब्दी वर्ष में ‘दारा शिकोह सेंटर फॉर इंटरफेथ डायलॉग एंड अंडरस्टैंडिंग’ की स्थापना की। इतिहास भले ही दारा शिकोह को उनका उचित स्थान न दे पाया हो, परंतु एएमयू ने उनकी विरासत को लोकप्रिय बनाने का बीड़ा उठाकर सुधार की दिशा में कदम बढ़ाया है।
यह केंद्र कई महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है, जैसे — दारा शिकोह की रचनाओं का अन्य भाषाओं में अनुवाद, उनके जीवन और कार्यों पर भारत और विदेश में हुए शोध का संकलन, हिन्दू धार्मिक ग्रंथों पर मुस्लिम लेखकों और मुस्लिम ग्रंथों पर हिन्दू लेखकों द्वारा किए गए कार्यों की ग्रंथ-सूची बनाना आदि। यह पहल एक उदार मस्तिष्क और दृष्टिकोण के साथ की गई है। एएमयू के संस्थापक सर सैयद अहमद खान ने भी अन्य धर्मों के ग्रंथों को समझने हेतु उन पर टिप्पणियाँ लिखीं थीं।
दारा शिकोह, एक सच्चे भारतीय संतान के रूप में, सहिष्णुता, समरसता और एकता के प्रतीक हैं। इन्हीं मूल्यों के कारण हम भारतीयों ने सदियों से विविधताओं के बावजूद एकता और सौहार्द में जीवन व्यतीत किया है। भारत के पड़ोसी और उनके शासन इस मूल्य से बहुत कुछ सीख सकते हैं।
लेखक अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़ के पूर्व कुलपति हैं।


