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Wednesday, May 20, 2026

धरती का दम घोंटती प्लास्टिक : हर सांस, हर कण में ज़हर – शाहिद सईद

21वीं सदी के तेजी से बढ़ते आधुनिक युग में जहां एक ओर तकनीकी प्रगति ने मानव जीवन को सुविधाजनक बनाया है, वहीं दूसरी ओर प्लास्टिक जैसी ‘क्रांतिकारी खोज’ ने पर्यावरण के समक्ष एक अभूतपूर्व संकट खड़ा कर दिया है। प्लास्टिक प्रदूषण केवल एक पर्यावरणीय चिंता नहीं है, यह एक सर्वव्यापी आपदा है जो हमारी धरती, जल, वायु, जैव विविधता और अंततः हमारे शरीर और जीवन प्रणाली को अपनी चपेट में ले चुका है। यह वह धीमा ज़हर है, जो हर दिन, हर सांस और हर कण के माध्यम से हमारे भीतर समाता जा रहा है — और हम शायद इसकी भयावहता को अब भी पूरी तरह नहीं समझ पाए हैं।

प्लास्टिक की शुरुआत एक वरदान के रूप में हुई थी। यह हल्का था, टिकाऊ था, सस्ता था और अनेकों प्रकार के उपयोगों में आसानी से ढल जाता था। घर से लेकर उद्योग, अस्पताल से लेकर खेती तक, हर क्षेत्र में प्लास्टिक ने अपना स्थान बना लिया। लेकिन इसी अत्यधिक उपयोग और गैर-जवाबदेह उपभोग ने इसे एक अभिशाप में बदल दिया। प्लास्टिक का विघटन नहीं होता, यह नष्ट नहीं होता — यह बस बिखरता है, टूटता है और सूक्ष्म कणों (माइक्रोप्लास्टिक) के रूप में हमारी हवा, मिट्टी और पानी में घुल जाता है। आज यह संकट हमारे भोजन, पीने के पानी, हवा और यहां तक कि हमारे रक्त में प्रवेश कर चुका है।

विश्व स्तर पर हर साल 400 मिलियन टन से अधिक प्लास्टिक का उत्पादन होता है, परंतु इसका केवल 9% ही पुनर्चक्रित हो पाता है। शेष कचरा समुद्र, नदियों, ज़मीन और भूजल स्रोतों को प्रदूषित करता है। भारत में भी यह समस्या अब विकराल रूप ले चुकी है — 2023 में ही भारत में 45 लाख टन प्लास्टिक कचरे का उत्पादन हुआ, जिनमें से अधिकांश थैलियां, बोतलें, रैपर, डिस्पोजेबल बर्तन, मेडिकल कचरा, और पैकिंग सामग्री के रूप में हमारे आस-पास फैला है।

समस्या की गंभीरता तब और बढ़ जाती है जब हम इसके बहुआयामी प्रभावों का विश्लेषण करते हैं। जल निकायों में फेंका गया प्लास्टिक समुद्री जीवन के लिए प्राणघातक सिद्ध हो रहा है। मछलियाँ, समुद्री कछुए और पक्षी इसे भोजन समझकर निगल जाते हैं और असहनीय पीड़ा या मृत्यु को प्राप्त करते हैं। दूसरी ओर, प्लास्टिक के छोटे-छोटे कण यानी माइक्रोप्लास्टिक अब हमारे नल के पानी, नमक, दूध, शहद, और यहां तक कि मां के दूध तक में पाए जाने लगे हैं। एक सामान्य व्यक्ति हर सप्ताह औसतन 5 ग्राम प्लास्टिक निगल रहा है — यानी हर हफ्ते एक क्रेडिट कार्ड जितना प्लास्टिक उसके शरीर में जा रहा है।

इसका असर केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी यह संकट गंभीर रूप ले रहा है। माइक्रोप्लास्टिक के संपर्क से हार्मोन असंतुलन, कैंसर, प्रजनन विकार, यकृत और किडनी संबंधी बीमारियां बढ़ रही हैं। यही नहीं, जब प्लास्टिक को जलाया जाता है, तब यह डाइऑक्सिन और फ्यूरन जैसी विषैली गैसें छोड़ता है जो सांस संबंधी रोगों का कारण बनती हैं और वायु गुणवत्ता को बेहद खराब कर देती हैं।

आर्थिक दृष्टिकोण से भी यह संकट कोई छोटा नहीं है। नगरपालिकाओं पर कचरा प्रबंधन का भारी बोझ पड़ता है — अकेले भारत में हर साल ₹3,500 करोड़ से अधिक की लागत सिर्फ प्लास्टिक कचरे के निपटान में लगती है। इसके अलावा, पर्यटन उद्योग, खासकर समुद्री और पर्वतीय स्थलों पर, इस प्रदूषण से बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। मत्स्य उद्योग को भी भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है — समुद्री जीवों की संख्या में गिरावट के कारण लाखों लोगों की आजीविका खतरे में है। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, यह समस्या हर साल वैश्विक मत्स्य उद्योग को $13 बिलियन से अधिक का नुकसान पहुंचा रही है।

यह संकट केवल भौतिक या आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक भी है। झुग्गी-बस्तियों में प्लास्टिक कचरे से जल निकासी रुक जाती है, बीमारियाँ फैलती हैं, और स्वच्छता की स्थिति बदतर होती है। गांवों में पशु प्लास्टिक खाकर बीमार पड़ते हैं या मर जाते हैं। त्योहारों, मेलों और शादियों जैसे सामाजिक आयोजनों में प्लास्टिक की भरमार एक नई प्रकार की सांस्कृतिक अव्यवस्था पैदा कर रही है।

हालांकि सरकार और वैश्विक संस्थाओं ने समय-समय पर पहलें की हैं — जैसे भारत में सिंगल यूज़ प्लास्टिक पर प्रतिबंध, ‘प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स’, ‘ईपीआर नीति’, या फिर संयुक्त राष्ट्र की अगुवाई में ‘ग्लोबल प्लास्टिक ट्रीटी’ की प्रक्रिया। परंतु कानून और नियम केवल तब प्रभावी होते हैं जब नागरिक समाज, उद्योग जगत और प्रशासन मिलकर उन्हें ज़मीन पर लागू करें।

समाधान की दिशा में सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता है। विद्यालयों, कॉलेजों, पंचायतों में जनजागरूकता अभियान चलाने होंगे। समाज आधारित पहलें जैसे ‘प्लास्टिक बैंक’ और ‘प्लास्टिक मुक्त गांव’ अभियान को प्रोत्साहन देना होगा। हमें कपड़ा, जूट, बांस जैसे वैकल्पिक उत्पादों को बढ़ावा देना होगा। नवाचार आधारित स्टार्टअप्स जैसे ‘इकोराइट’, ‘बेयर नेसेसिटीज’ और ‘बनयान नेशन’ जैसी संस्थाओं को सहयोग देना होगा जो प्लास्टिक के विकल्पों पर काम कर रही हैं। सबसे महत्वपूर्ण यह कि नगरपालिका और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड जैसी संस्थाओं को तकनीकी और कानूनी शक्ति से लैस करना होगा ताकि वे निगरानी और प्रवर्तन की भूमिका प्रभावी ढंग से निभा सकें।

लेकिन यह लड़ाई सिर्फ सरकारों और संस्थाओं की नहीं है — इसमें सबसे बड़ी भूमिका आम जनता की है। जब तक हम स्वयं जागरूक नहीं होंगे और अपने व्यवहार में बदलाव नहीं लाएंगे, तब तक यह संकट नहीं रुकेगा। हमें प्लास्टिक का उपयोग छोड़ने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। यदि हम थैलियों, बोतलों, डिस्पोजेबल वस्तुओं आदि का इस्तेमाल बंद कर दें, तो प्लास्टिक की मांग में भारी कमी आएगी और इसका उत्पादन भी घटेगा। जनता की सामूहिक इच्छाशक्ति ही इस ‘प्लास्टिक के ज़हर’ का प्रभावी रूप से अंत कर सकती है। अब समय आ गया है कि हम न सिर्फ जागरूक बनें, बल्कि इस लड़ाई में खुद आगे बढ़ें।

प्लास्टिक प्रदूषण की चुनौती एक वैश्विक चिंता है लेकिन उसका समाधान स्थानीय स्तर से शुरू होता है। यह केवल पर्यावरण संरक्षण नहीं, मानव अस्तित्व की रक्षा का प्रश्न है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण राष्ट्र को चाहिए कि वह इस संकट से लड़ने के लिए वैश्विक नेतृत्वकारी भूमिका निभाए — न केवल एक ‘प्लास्टिक-स्मार्ट’ देश बने बल्कि संपूर्ण विश्व के लिए एक आदर्श प्रस्तुत करे।

लेखक एक वरिष्ठ पत्रकार और समाजसेवी हैं

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