अशफाक उल्ला खां, इलाहाबाद से लियाक़त अली, बरेली से ख़ान बहादुर ख़ां, फ़ैज़ाबाद से मौलवी अहमद उल्ला, फ़तेहपुर से असीमुल्ला, मौलाना अबुल कलाम, ब्रिगेडियर एम उस्मान, मेजर अनवर करीम और ऐसे ही अनगिनत क्रान्तिकारी वतनपरस्ती के दीवाने थे। जिन्होंने ज़ाति धर्म से ऊपर उठकर मादरे वतन हिन्दुस्तां की आन-बान-शान की हिफ़ाज़त के लिए बिना परवाह, जान तक न्यौछावर कर दिया। इन सब महान शख़्सियतों ने धर्म की रोश्नी में हिब्बुल वतनी को सर्वोपरि माना। इन्होंने सही मायने में ज़िंदगी की रहमत, क़ुरबानी और वतनपरस्ती को समझा। इन आला शख़्सियतों के ज़िक्रो-फ़िक्र के साथ इस आर्टिकल में आज हम ये जानने और समझने की कोशिश करेंगे की क़ुरान रहमत व शफ़क़त का रास्ता दिखाता है ज़ुल्मो-सितम का नहीं।
वैसे मुसलमान जो ग़लत हदीसों और आधे-अधूरे मुल्लाओं की वजह से भटके हुए हैं उनको दीन की सही तालीम की सख़्त ज़रूरत है। हर मुसलमान को क़ुरान शरीफ़ और अपने पैग़मबर (शांति दूत) मोहम्मद साहब के बताए हुए सही रास्ते पर चलना चाहिए। और वो रास्ता है— शांति व प्रेम का, मिल्लत व सद्भाव का, हिब्बुल वतनी का। वतनपरस्ती और वतन से मोहब्बत अंबिया की सुन्नत है। वतनपरस्ती और अपने हमवतनों से मोहब्बत की पवित्र परंपरा हम इंसानों और परिंदों में ही नहीं बल्कि अल्लाह के भेजे तमाम दूतों, नबियों और पैग़मबरों की भी रही हैं। हर नबी या पैग़मबर ने अपने वतन और हमवतनों से मोहब्बत को तरजीह दी।
क़ुरान मुसलमानों की पवित्र ग्रंथ है। अल्लाह ने इस किताब को नाज़िल किया था। अल्लाह के मैसेंजर जिब्राएल ने पैग़मबर हज़रत मुहम्मद को पहली बार क़ुरान-ए-पाक सुनाई थी। तभी से इस किताब को मुस्लिम धर्म की नींव माना जाता है। क़ुरान में कुल 30 पारे, 114 सूरह, 540 रूकू, 14 सज्दा, 6,666 आयत, 86,423 शब्द, 32,376 अक्षर, 24 नबियों का ज़िक्र है। आदम इस्लाम के पहले नबी हैं और हज़रत मोहम्मद मुसलमानों के आख़िरी पैग़मबर हैं।
कुरान के हर सूरा की शुरूआत में “बिस्मिल्ला हिर्रहमानिर्ररहीम” आता है। इसका मतलब है “अल्लाह के नाम से” या “ईश्वर के नाम से” (“In the name of God”), इस्लाम धर्म में कोई भी काम शुरू करते समय “बिस्मिल्लाह-हिर्रहमा-निर्रहीम” पढ़ते हैं, जिस का मतलब है, “अल्लाह के नाम से जो दयालु और कृपाशील है”। दूसरे शब्दों में इसके मायने हैं, अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान व रहमत वाला है। कोई भी काम चाहे वह अहम् हो या न हो, बिस्मिल्ला के बिना मुकम्मल नहीं होगा। इसकी वजाहत खुद पैगंबर (SAW) ने की थी। एक हदीस के मुताबिक़, पैगंबर (SAW) ने कहा,“कोई भी अहम काम जो बिस्मिल्लाह से शुरू नहीं होता है वह ना मुकम्मल है”।
ज़ाहिर है कि जिस क़ुरान के हर सूरे में ख़ुदा से रहमत की बात कही गयी हो, वह कभी हिंसात्मक या उग्रवाद हो ही नहीं सकता। अल्लाह के सारे खलीफ़ा या नबियों का एक ही पैग़ाम है— ख़ुदा के बताए हुए राह पर क़ायम रहो, ईमान रखो और अल्लाह पर भरोसा रखो। हर धर्मों-मज़हबों में ये एक समान पैग़ाम है। हिन्दू धर्म में मनु की सन्तानों को मनुष्य कहा जाता है, इस्लाम में आदम की सन्तानों को आदमी कहा जाता है और आदम को ही इसाइयत में एडम कहा जाता है। कुल मिलाकर राम, रहीम और हनुमान, रहमान के पैग़ाम में कोई फ़र्क़ नहीं है। सिर्फ़ मानने और इबादत का तरीक़ा अलग है। इसी तरह हर धर्म में क़ुर्बानी की बात कही गयी है लेकिन उसका यह मतलब नहीं है कि जीव, जन्तु, पशु, पक्षी की हत्या की जाए। क़ुर्बानी का असल मतलब है कि अपनी आवश्यकता से अधिक धन-दौलत एवं विद्या गरीबों और ज़रूरतमंदों के लिए क़ुर्बान करना।
ज़मीं पर किसी को भेजे हर इंसान को ख़ुदा ये नसीहत देता है कि तुम एक तय मुद्दत के लिए ज़मीं पर जा रहे हो.. तुम्हें वहां नेकी के रास्ते पर चलना है। ज़िन्दगी पॉजिटीविटी के साथ गुज़ारनी है। भलाई का काम करना है। किसी को बेवजह तंग करना, तकलीफ पहुंचाना, बिना मतलब ख़ुदा की नेमतों जैसे पानी की बरबादी, आबो-हवा से खिलवाड़, वायुमंडल को प्रदुषित करना, पेड़ काटना, जीव हत्या करना, झूठ बोलना, फ़रेब करना, धोखा देना, ज़ना करना, सूदखोरी जैसे ग़लत कामों को क़ुरान में गुनाह माना गया है। ऐसा करने वाला इंसान सज़ा का भागीदार होगा। ज़िन्दगी का सबसे बड़ा सच है मौत… यानी हर इंसान को एक न एक दिन वापस अल्लाह के पास ही जाना है। कयामत के दिन उसके अच्छे और बुरे कामों का हिसाब होगा।
अगर किसी ने ग़लत रूप से इस्लामिक विवेचना की है (हिदायत की है या हदीस लिखी है) वैसी हदीसों को दरकिनार किया जाना चाहिए। ग़लत हदीस के ज़रिए अगर मज़हबी खामियां पेश की गई हैं तो उन्हें फौरन दूर किया जाना चाहिए। उदाहरण के तौर पर देखें तो इस्लाम में “तीन तलाक़” नाम की कोई चीज़ कभी थी ही नहीं। लेकिन अनपढ़ों के अलावा पढ़े लिखे जाहिलों ने भी अपने ज़ाति मफ़ाद के लिए इसका बेजा इस्तेमाल किया जिससे दुनिया भर में लाखों घर बरबाद हुए। कटकाजी मुल्लाओं और जहालत की वजह से इस्लाम की काफी बदनामी हो रही थी। जो लोग भी इस्लाम को नहीं जानते हैं वो यही समझते थे कि इस्लाम में शायद ऐसा ही होता है। जबकि ये सरासर गुनाह है। इन्हीं सब बातों को देखते हुए आखिरकार सरकार और सुप्रीम कोर्ट को इसमें दखल देकर कानून लाना पड़ा।
अहिंसा, प्रेम, सद्भाव ही सभी धर्मों का मूलमंत्र है। सबका मालिक एक है। फ़र्क़ है तो सिर्फ नज़रिये और इबादत करने के तौर तरीके का। कोई मंदिर में शीश नवाता है तो कोई मस्जिद में सजदे करता है। कोई गुरूद्वारे में अरदास करता है तो कोई गिरिजाघर में सर झुकाता है। हर धर्म में बातें इंसानियत और मानवता की ही होती हैं। अच्छाइयां, बुराइयां, कमियां, ख़ामियां तो हर जगह, हर तबक़े, हर समूदाय, हर ख़ेमे, हर घर में होती हैं। लेकिन असल इंसान वही है जिसे वक़्त रहते अक़ल आजाए। इंसान को तालीम की रौशनी में सच्चाई और भलाई के रास्ते पर अपनी ज़िन्दगी परोपकार और सादगी के साथ गुज़ार दे। तभी उसके दुनिया में आने का सही मक़सद है। ग़लत राहों पर चलने वाले, ज़ुल्मों सितम करने वालों, गुनाहों में डूबे लोगों की ज़िदगी के कोई मायने नहीं होते। वो इंसानों की शकल में हैवान कहे जासकते हैं। अल्लाह ने ऐसे लोगों के लिए सख़्त से सख़्त सज़ा तय कर रखी है। ऐसे लोग जहन्नुमी कहलाएंगे।
सवाल ये उठता है कि आम मुसलमान गलतियां क्यों करता है? क्योंकि अव्वल तो वो क़ुरान पढ़ता नहीं है और पढ़ता है तो समझता नहीं है। क़ुरान अरबी भाषा में लिखी हुई है। जो लोग अरबी भाषा में क़ुरान पढ़ते हैं उनकी तादाद कुल मुसलमानों की तादाद से काफी कम है। उनमें से भी क़ुरान को समझ के पढ़ने वालों की तादाद काफी कम है। अहम बात ये है कि जब क़ुरान पढ़ा जाए तो उसके सही तरजुमे को भी जाना जाए। अगर इंसान क़ुरान में लिखी आयतों को सही तौर पर समझने लगे तो उसकी जिन्दगी तब्दील हो जाएगी। वो गलत हदीसों और शरारती ताकतों के बहकावे से दूर अपनी एक नई दुनिया बसाएगा, जो उसे दीन और दुनिया दोनों में कामयाबी अता करेगी इंशाअल्लाह।
लेखक एक वरिष्ठ पत्रकार और समाजसेवी हैं ।





