तौहीद अरबी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है अल्लाह या ईश्वर को मानना। इस्लाम में तौहीद या एकेश्वरवाद उसकी मूल धारणा है। हजरत मुहम्मद (सल्ल.) पूज्य नहीं बल्कि एक मनुष्य है। हालाँकि आप मानवता के एक नायक और सम्पूर्ण मानवता के अन्तिम पैगम्बर है। दुनियावी चीजें मनुष्य पशु प्रकृति आदि सब कुछ उसकी पैदा की हुई है। इस्लाम का अर्थ है समर्पण और आज्ञापालन। समर्पण का अर्थ अल्लाह के आदेशों को स्वीकार करना और आज्ञापालन का अर्थ है अल्लाह के आदेशों को व्यवहार में लाना।
हिन्दू (सनातन) धर्म एक जीवन पद्धति है। हिन्दू अपभ्रंश फारसी शब्द है। यह धर्म अपने अन्दर कई अलग-अलग उपासना पद्धतियां, मत, सम्प्रदाय और दर्शन समेटे हुए है। हिन्दू धर्म के अनुसार मनुष्य ईश्वर से भिन्न नहीं है। ईश्वर ही स्वयं सृष्टि का रूप धारण करते हैं। हिन्दू धर्म इस अद्वैत सत्य के साक्षात्कार को ही जीवन का परम लक्ष्य मानता है। ईश्वर के भिन्न-भिन्न नाम व रूप है लक्ष्य तक पहुँचने के लिए अनेक मार्ग बतलाए गए हैं। अतः हिन्दू धर्म में पूरी सृष्टि को ही ईश्वर माना गया है।
ब्रह्मा देवानां प्रथमः सम्भूव
विश्वस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता ।
तौहीद या एक ईश्वर की अवधारणा ने दाराशिकोह को बहुत मुतासिर किया। उनका मानना था कि सभी रास्ते हमें एक ईश्वर की ओर ले जाते हैं। दाराशिकोह ने कहा-
“तौहीद का रहस्य यह है कि हे मेरे मित्र इसे समझो कहीं पर ऐसा कुछ नहीं है जहाँ ईश्वर न हो। जो कुछ तुम उससे अलग देखते या जानते हो उसका नाम नले ही कुछ और हो परन्तु वास्तव में वह ईश्वर ही है।”
उपनिषनों का फारसी अनुहारकालिंग पब्लिशर्व इण्डिया।
ईश्वर एक है और सदा से है, उसी को अलग-अलग भाषाओं एवं धर्मों में अल्लाह ईश्वर ब्रह्म, गौड, तथागत वाहेगुरु आदि नामों से पुकारा जाता है। संसार में जितने भी धर्म हैं वह किसी न किसी रूप में एक अन्तिम सत्ता में विश्वास रखते हैं और एक ही सर्वशक्तिमान अस्तित्व की मान्यता से ही प्रत्येक धर्म की शुरूआत होती है। सर्वशक्तिमान ने तो एक ही धर्म की स्थापना की थी ऐसा सभी धर्मग्रन्थों से ज्ञात होता है।
ऋग्वेद के अनुसार “एक सत् विप्राः बहुधा वदन्ति
(ऋ. 1/164/46)
अर्थात् एक ही परमसत्य को विद्वान कई नामों से पुकारते हैं।
कुरान में सुरह फातिहा में कहा गया “अलहम्दो लिल्लाहि रब्बिल आलमीन” अर्थात् संसार की सारी प्रशंसाएँ अल्लाह के लिए हैं जो सारे जहाँ का मालिक है। ऋग्वेद में ईश्वर की एकरूपता का वर्णन किया गया है-
“य एकइत् तमुष्टि ही”
(ऋग्वेद 6/45/16)
अर्थात वह एक है उसी की उपासना करो।
आदि गुरु शंकराचार्य ने कहा है-
“एको ब्रह्म द्वितियो नास्ति” अर्थात् एक ही परब्रह्म परमेश्वर है दूसरा कोई नहीं।
पवित्र कुरान में ईश्वर को एक होने के संदर्भ में कहा गया-
“कुल हुवल्लाहु अहद अल्लाद्दुस्समद लमया लिद् वलम यू लद, वलमया कुल्लहू कुफोवन अहद ।।
(कुरआन-112)
अर्थात् पैगम्बर (मुहम्मद) कह दीजिए ईश्वर अकेला है। ईश्वर (अल्लाह) सर्व सम्पन्न है, वह सबसे निरपेक्ष है और सब उसके मोहताज है न उसकी कोई संतान है और न वह किसी की संतान है और उसका कोई समकक्ष नहीं है।
सिख धर्म के गुरु गुरुनानक जी ने उसी एक परमेश्वर के हर रूपों में स्तुति की है-
एक ओकार सतनाम करता, परखु निर्भऊ निवैरु।
अकाल मूरति से भंगुर प्रसाद जपु आदि सचु जुगदि सचु
हैभि सचु नानक ही सिभि सचु।
अर्थात एक ही ओम्कार नामक परमेश्वर है, वही सत्य है, उसका न तो कोई वैरी है और न उसे किसी से डर है। वह सदा समान रूप से रहने वाला है। वह स्वयंभू है. अर्थात वह किसी से पैदा नहीं हुआ, जो संसार से पहले भी वही एक सत्य मौजूद था और समाप्ति के बाद भी वही सच मौजूद रहेगा। जौ मौजूद है वह भी सच है और जो मौजूद रहेगा वह भी सच है। नानक जी का निर्देश है कि क्षणभंगुर प्रभु के प्रसाद स्वरूप मानव तुम उसी का जप करो।
जैन धर्म में अनुशासन जीवन के द्वारा जो प्राणियों को संसार के दुख से उठकर उत्तम सुख (मोक्ष) की ओर ले जाए उसे धर्म कहते हैं।
कुरान में ईश्वर की सत्ता के बारे में कई स्थानों पर आया है कि उसकी सत्ता सदा से रही है और आगे भी सदा रहेगी।
“इन्नल्लाह बिकुल्लि शैइन मुहीत” एक अल्लाह सदा से है और सत्य ग्रन्थों में किसी न किसी नाम से विद्यमान है। कुरान के अनुसार ईश्वर का भेजा हुआ धर्म शुरू से एक ही रहा है और कयामत (प्रलय) तक एक ही रहेगा, अलबत्ता लोगों ने इसमें अपनी मर्जी और स्वार्थ के लिए परिवर्तन कर डाला।
उस ईश्वर ने तुम्हारे लिए वह धर्म नियुक्त किया जो उसने नूह (मनु) पर अवतीर्ण किया था और जो हमने (हे मुहम्मद) तुम पर अवतीर्ण किया और वही जो हमने इब्राहीम व मूसा व ईसा पर यह कहते हुए उतारा था कि इसी धर्म को स्थापित करना तथा इसमें परस्पर टुकड़े-टुकडे न हो जाना।
(कुरान 42.13)
और इन्सान तो एक ही मत के मानने वाले थे फिर बाद में उन्होंने परस्पर मतभेद किया।
(कुरान 42.13)
ऋग्वेद में ईश्वर की सत्ता के सम्बन्ध में कहा गया है जहाँ आकाश और पृथ्वी मिले हुए थे और फिर अलग-अलग हुए वहां जो धर्म की बुनियाद (मानव) नहीं ईश्वर ने रखी थी, पुनःपाकर विश्व के ऋषिगण स्वयं भी शान्त होगे और विश्व को भी शान्त करेंगे। ऐसे ही रहस्यों का उद्घाटन जिसमें ईश्वर की सत्ता सदा से मौजूद है।
(ऋ01.62.6.7.11)
धर्म ईश्वर के प्रति इंसान की सम्पूर्ण श्रद्धा है। धर्म के लिए तीन आवश्यक तत्त्वों बुद्धि (Knowing or reason) भावना (Fealing of effective element) और क्रिया (Connective Element) का होना नितान्त जरूरी है। कर्म का मूल धर्म और धर्म का मूल श्रेष्ठ आचरण करना है। धर्म का अर्थ धारण करना है। दुनिया के समी मजहबों का उद्देश्य मानव कल्याण है। सभी समन्वय और सद्भावना की भावना से पूर्ण किया जा सकता है। यह समन्व्यवादी, सद्भावना और विविधता में एकता भारत की विशेषता है।
सभी धर्मों में समानताएँ :-
दूसरे लोगों के कृत्यों की निदा न करना, अपने मानवीय धर्म का निस्तर पालन करना, दीनों के प्रति दया करना, लोक व्यवहारों में सब के प्रति मधुर वचन-बोलना, प्राण की परवाह न करते हुए सदा परोपकार के कार्यों को करते रहना, घर पर आये मित्रों और मेहमानों और दोस्तों को दिल से लगाना, उनके साथ आदर और मोहब्बत से पेश आना। अपनी शक्ति के अनुसार दान देना, लोगों के कड़वे व्यवहारों एवं कठोर वचनों को सहन करना अपनी समृद्धि, सफलता एव विकास पद प्रतिष्ठा और उन्नति के अवसरों पर पूरी तरह से निर्विकार रहना दूसरों के दुःख देने वाली बातों को न करना, दूसरों की उन्नति पर जलन न होना और अधिक नहीं बोलना चाहिए, बांधवो के साथ अटूट सम्बन्ध बनाये रखना और सज्जनों के सरल भाव से सन्तुष्ट रखना आदि सभी सदाचार है और इन्हीं के उच्च आदर्शों से इन्सान को समान रूप से सुख में जीवन जीने का अवसर मिलता है।
लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के ज़ाकिर हुसैन कॉलेज के संस्कृत विभाग में सहायक प्रोफेसर हैं।


