तवज्जौ अब तो करनीं ही पड़ेगी इल्म की जानिब,
न होगा यह तो जीने का कोई सामां नहीं होगा।
बग़ैरे इल्म मिलना अब तो मजदूरी भी मुश्किल है,
न होगा इल्म जब तक आदमी इंसा नहीं होगा।
सलीस गुन्नौरी
शायर का शेर इस उपलक्ष में चरितार्थ है कि हमारा देश दुनिया में मुसलमानों की तीसरी सबसे बड़ी जनसंख्या वाल देश है। हमारे मुल्क के मुसलमानों की शैक्षिक और आर्थिक बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती। हमारे देश का हर चौथा भिखारी मुस्लिम है। यहाँ की आबादी में मुसलमान लगभग 15 प्रतिशत है, जबकि भिखारियों की आबादी में उनकी हिस्सेदारी लगभग 25 प्रतिशत है। सन् 2011 की जनगणना के आंकड़ों पर हम दृष्टि डालें, तो यह बात साफ हुई है कि मुसलमानों की स्थिति भारत में बहुत दयनीय है। इसी सन्दर्भ में 30 नवंबर 2006 को जस्टिस राजिन्दर सच्चर आयोग की 403 पेज की रिपोर्ट लोकसभा में रखी गई जिससे ज्ञात हुआ था कि भारत में मुसलमानों की हालत दलितों से भी खराब है।
दूसरी ओर विप्रो वाले अज़ीम प्रेम जी पिछले कुछ वर्षों में भारत के सबसे बड़े दानी के रूप में उभरकर सामने आये है। हाल फिलहाल में कोरोना वैश्विक महामारी से लड़ने के लिए उन्होंने 1125 करोड़ रूपये खर्च करने का ऐलान किया है। जिसके खर्च करने का भार भी उन्होंने स्वयं अपने फाउंडेशन के माध्यम से उठाने का फैसला लिया है।
आज की एक चुनौती यह भी है कि आम भारतीय मुसलमान प्रतिदिन औसतन सिर्फ 33 रूपये ही खर्च कर पाता है, जबकि उसके सिख भाई का प्रतिदिन खर्च औसतन 56 रूपये है और हिन्दू भाई का प्रतिदिन खर्च औसत 38 रूपये प्रतिदिन है। इन आँकड़ों से ज्ञात होता है कि भारतीय मुसलमानों का वास्तविक चेहरा क्या है? आंतकवाद तथा गौहत्या की मोहर उस पर पहले ही लग चुकी है। जिससे यह बात उभरकर सामने आती है कि मुसलमान आज की तारीख में शायद सबसे ज्यादा मानसिक यंत्रणा सहने वाला जीव बन चुका है।
आज चारों तरफ मुसलमानों को शक कि निगाह से देखा जा रहा है। उसकी समस्या को दूर करने वाला कोई नहीं है। इसी दर्द को एक शायर ने इस प्रकार कहा था –
साहिल के तमाशाई, हर डूबने वाले पर,
अफसोस तो करते हैं, इमदाद नहीं करते।।
शायद यही कारण है कि सच्चर कमेटी की रिपोर्ट को पेशकर यूपीए की अपनी सरकार को ही खठघरे में खड़ा कर देने का साहस दिखाने वाली सोनिया गाँधी ने भी सच्चर कमेटी की सिफारिशों को भी लागू नहीं किया। इस असहाय पीड़ा को आज भी भारतीय मुसलमान अपने हृदय में छुपाये बैठा है। मुस्लिम कौम पूरी तरह से आज भी इसी अवसाद में जीवन-यापन कर रही थी कि नौकरी, शिक्षा और राजनीति में उनकी हिस्सेदारी पूरी तरह से ख़त्म कर गई। आजादी प्राप्त करने के उपरांत भी मुस्लिम बस्तियों की पहचान टाट के परदे और गंदी गालियाँ ही रहीं।
इराक पर जब अमेरिका ने हमला किया था तो दिल्ली जामा मस्जिद पर इकठ्ठा मुसलमानों ने जबरदस्त जुलूस निकाल दिया था। लेकिन सीरिया और अफगानिस्तान पर अमेरिकी हमलों के समय वही मुसलमान खामोश रहा।
अब वह पीढ़ी गुजर चुकी है जिसने विभाजन देखा था नई पीढ़ी ने बाबरी मस्जिद विध्वंस से अधिक मुंबई ब्लास्ट और 2002 के गुजरात नरसंहार की फुटेज देखी है। दूसरी ओर आमिर और शाहरुख की फिल्में देखने में भी अब उनकी वह रूचि नहीं रही है। जो प्राय: पहले कभी हुआ करती थी जिसका एक महत्त्वपूर्ण कारण इंटरनेट और सोशल मीडिया की ओर आकर्षण भी हो सकता है। क्योंकि जो बातें पहले कही या सुनी जाती थी आज इंटरनेट के माध्यम से उनके बहुत करीब पहुँचा जा सका है तथा वास्तविकता के समक्ष एक पहुँच बन सकी है धीरे-धीरे उसके रोल मॉडल भी बदलते जा रहे हैं।
मुसलमानों ने संघर्ष करते हुए अपनी चुनौतियों को अवसर में बदलने का प्रयास किया है। इसी क्रम में आज वह आजादी के 73 वर्ष बाद भी धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए संघर्ष कर रहा है और जिंदगी के हर क्षेत्र में प्रगति करता हुआ दिखाई दे रहा है, इस उम्मीद के साथ कि उसका भविष्य अपने ही देश में सुरक्षित हैं। वैश्विक महामारी कोरोना के साथ-साथ कोई भी समस्या हो वह अपने देश के लिए हर प्रकार से बलिदान देने के लिए तैयार रहता है। शिक्षा के क्षेत्र में भी अब वह धीरे-धीरे सुधार कर रहा है। पिछले सालों में प्रशासनिक पदों पर मुसलमानों की बढ़ती भर्तियाँ इसका प्रमाण हैं। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय अलीगढ़ के कुलपति आदरणीय प्रोफेसर तारिक मंसूर साहब के आग्रह पर पूरी अलीग बिरादरी ने 1. 33 करोड़ की प्रधानमंत्री सहायता कोष में सहयोग राशि देकर यह पूरी तरह से सिद्ध कर दिया कि हम अपने कुलपति और देश के लिए पूर्ण रूप से समर्पित हैं और अगर देश पर किसी भी तरह का संकट आयेगा। तो देश का मुसलमान उस संकट का सामना करने के लिए देश के साथ खड़ा होगा।
सम्भवत: आज कई समस्याओं और चुनौतियाँ मुस्लिम समाज के सामने हैं। परन्तु उनकी नई पीढ़ी बदलते हुए सामाजिक वातावरण में और बदलाव चाहती है। भारत में न तो वह किसी कट्टरवादी सोच से जुड़ी है और न ही किसी आतंक के रास्ते पर है। वह पूरी तरह से भारत के संविधान पर भरोसा रखकर नए-नए रास्ते बनाने का प्रयास कर रही है। जिसमें सबसे बड़ा योगदान शिक्षा है। जिसके सहारे वह निरंतर प्रगति पर अग्रसर रहकर न सिर्फ़ भारत में, बल्कि पूरे विश्व में अपने देश का नाम रोशन कर रही है और आगे भी करती रहेगी।
लेखक सैय्यद हामिद सीनियर सेकेंडरी स्कूल, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में पोस्ट ग्रेजुएट टीचर (हिंदी) हैं।


