कोई भी समाज बहुत लम्बे समय तक परम्पराओं और धार्मिकता के आधार पर अपना विकास नहीं कर सकता । समय और परिस्थिति के अनुसार समाज की आवश्यकता और परम्पराएँ परिवर्तित होती रहती हैं; क्योंकि समाज सदैव गतिशील होता है । समाज में गतिशीलता और परिवर्तन बनाए रखने के लिए समाज को हमेशा परिवर्तन के लिए तैयार रहना चाहिए ताकि समाज को प्रगतिशील बनाया जा सके। परम्पराओं और धार्मिकता के आवेश में आकर किसी समाज का कल्याण नहीं हो सकता। एक ऐसा समाज जो हमेशा धार्मिकता में उलझा रहता और राजनीतिक, सामाजिक मुद्दों को दरकिनार करके चलता है, और अपनी अज्ञानता और अमानवीय मान्यताओं को ही अपनी उन्नति समझता है; वो समाज कभी भी समाज की मुख्यधारा में शामिल नहीं हो सकता और सामाजिक विकलांगता से ग्रस्त हो जाता है। यही हाल है आज हमारे देश में मुस्लिम समाज का।
मुसलमानों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि उनमें सामाजिक और राजनैतिक चेतना की कमी है । मुसलमानों की सामाजिक और राजनैतिक चेतना का सबसे बड़ा संकट यह है कि उसने धर्म से थोडा सा अलग हटकर राजनैतिक चेतना के किसी भी स्वरुप की कल्पना नहीं की । इसके अलावा इस धार्मिक चेतना को भी राजनैतिक चेतना में बदल पाने का उसका कभी कोई प्रयास नहीं हुआ और न ही आज़ादी के बाद कोई परिणाम सामने आ सका।
मुसलमानों के राजनैतिक नेतृत्व के सामने बड़ा संकट यह भी है कि उसके पास राजनैतिक संघर्षों की कोई ऐसी परम्परा नहीं है जो धार्मिक प्रश्नों से अलग हो । ये मुस्लिम समाज की सबसे बड़ी विडंबना है कि जितनी भीड़ वे धार्मिक मुद्दों पर एकत्र कर लेते हैं उतनी ही राजनैतिक मुद्दों पर वे चुप्पी साध लेते हैं जैसे की राजनैतिक मुद्दे उनके लिए महत्वहीन हैं । मुस्लिम समाज अपनी सामाजिक समस्या और मुद्दे का निदान हमेशा धार्मिक मंच से ही तलाशता है उनकी इसी मानसिकता ने उन्हें धार्मिक नेतृत्व पर आश्रित बना दिया है, इसी कारण मुस्लिम समाज और अधिक धार्मिक जकड़न में उलझता जा रहा है । मुस्लिम धार्मिक संगठनों को चाहिए कि वे प्रगतिशील द्रष्टिकोण अपनाएँ और मुस्लिमों की धार्मिक चेतना के साथ-साथ उनकी सामाजिक और आर्थिक दशाओं के बारे में भी सोचे और उनकी सामाजिक प्रगति के लिए भी आगे बढ़ कर आये।
यदि मुसलमानों की राजनीतिक दशा की बात की जाये तो विडंबना यह है कि देश में 15 से 20 प्रतिशत की जनसँख्या वाले मुस्लिम समुदाय के पास कोई ऐसा कद्दावर रहनुमा नहीं है जो उनकी वास्तविक स्थिति का प्रतिनिधित्व कर सके और उन्हें प्रगतिशील विचार से पोषित करे । 67 वर्ष तक कांग्रेस रही हो या 25 वर्षों से मुलायम सिंह यादव या मायावती, जहाँ 1%-2% की जनसंख्या वाली जातियों के नेता मजबूत होकर इन्हीं दलों से निकले हैं, वहीं उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में मुसलमानों की जनसंख्या 18-20% होते हुए भी इन पार्टियों ने मुसलमानों का कोई नेता अपनी पार्टी में पैदा होने नहीं दिया।
कांग्रेस तो सदैव से यही करती रही और कभी मुस्लिम नेतृत्व को उभरने नहीं दिया , मुस्लिम नेतृत्व का राजनीतिक शो केस ( दिखावे के मुस्लिम नेता ) बनाकर मुस्लिम नेता को कोई पद दिया और वह सत्ता का मजा लेता रहा और मुसलमानों के वोट की कीमत उसे चुका दी गई, जैसे आज राज्य सभा मे नेता विपक्ष गुलाम नबी आजाद ले रहे हैं या पिछली कांग्रेस सरकार में सलमान खुर्शीद । इन्होंने कभी भी अपनी पार्टी से मुसलमानों से किये गये वादों को पूरा करने के लिए कोई सराहनीय कदम नहीं उठाये । कांग्रेस का इतिहास तो बहुत लंबा है तो उसके पास उदाहरण भी डाक्टर जाकिर हुसैन से लेकर गुलाम नबी आजाद तक सैकड़ों हैं । परन्तु वास्तविकता यह है कि तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों ने मुसलमानों को भाजपा का डर दिखा कर वोट हासिल किए और सत्ता प्राप्त की । मुलायम सिंह ने आजम खान जैसे बड़बोले नेता को मुसलमानों का नुमाईंदा दिखा कर अपनी राजनीति की, सिर्फ़ आजम खान को राज्य कैबिनेट मंत्री का दर्जा देकर मुलायम सिंह यादव ने मुसलमानों के वोट की कीमत चुका दी और मुस्लिम नेतृत्व उभरने नहीं दिया । मायावती भी कांग्रेस और समाजवादी पार्टी की नीति पर चलीं और जो कुछ मुसलमानों नें उनको कभी वोट दिया तो उस वोट की कीमत नसीमुद्दीन सिद्दीकी को अदा की गयी।
यदि भाजपा के सन्दर्भ में बात की जाये तो भाजपा ने तीन मुस्लिम नताओं एम. जे अकबर और मुख्तार अब्बास नकवी को राज्य सभा में सांसद मनोनीत किया और अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश से सैयद ज़फर इस्लाम को राज्यसभा भेजा । परन्तु तथाकथित सेक्युलर दलों ने एक भी मुस्लिम सांसद राज्य सभा में नहीं भेजा, इन सेक्युलर दलों के सेक्युलर चरित्र पर प्रश्न चिन्ह लगना लाज़मी है । अहमद पटेल जैसे पिछली दो कांग्रेस सरकारों के सबसे मजबूत व्यक्ति भी मुस्लिमों के दिखावटी नेता से ज्यादा और कुछ ना बन सके । मुलायम सिंह यादव जैसे नेता का मुसलमानों को 18% आरक्षण देने के वादा करके सरकार बनने के बाद उस पर कोई विचार विमर्श तक न करना यह दर्शाता है कि इन नेताओं ने मुस्लिम समाज को महज एक राजनीतिक ग़ुलाम के अलावा और कुछ नहीं समझा और उन्हें राजनीतिक रूप से कुपोषित बना दिया।
यदि वर्तमान की बात करें तो नरेंद्र मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने और भाजपा के सत्ता में आने से तथाकथित सेक्युलर दलों की मुख्य चिंता यह है कि अब किससे डराकर मुसलमानों से वोट ठगे जायें ? क्योंकि यह दल मुख्यत: भाजपा से डरा कर वोट मांगते थे न कि मुसलमानों के विकास के एजेंडे पर । अगर कांग्रेस, सपा, बसपा को यदि मुसलमानों का वोट चाहिए तो इन दलों को यह बताना होगा कि इनके पास मुसलामानों के लिए क्या-क्या योजनायें हैं और मुसलमानों को भी अपने विकास एजेंडे पर मत निर्धारण करना चाहिए । देश के मुसलमानों का मुख्य मुद्दा मूलभूत ढांचागत विकास का है न कि धर्म का । मुस्लिम क्षेत्रों व बस्तियों में शिक्षा, सड़कें, नालियां, स्कूल, परिवहन आदि की सुविधाएं नहीं है । रोजगार भी उनकी मुख्य समस्या है । इन समस्याओं को ध्यान में रखते हुए राजनीतिक दलों को वोट मांगने का आधार बनाना होगा । मुसलमानों को भी यह सोचना होगा कि वह भाजपा से डरकर वोट देते रहेंगे या विकास के एजेंडे पर अपने मतों का निर्धारण करेंगे ? मुसलामानों को समझदारी दिखाते हुए अपने विकास और सामुदायिक सुधार को मतदान का आधार बनाना होगा । और इन्हीं मुद्दों के आधार पर अपने मतों का निर्धारण करना होगा । मुस्लिम समाज को भी धार्मिक जकड़न से अलग हटकर देश की मुख्यधारा में शामिल होने के लिए सतत प्रयास करना चाहिए।
यह वास्तविकता है कि मुसलमान, समाज सुधार के प्रबल विरोधी होने के कारण ही अपना उतना विकास नहीं कर पाए जितना उन्हें अब तक कर लेना चाहिए था । मोदी सरकार के द्वारा जब तीन तलाक जैसी अमानवीय परम्परा के उन्मूलन के लिए कुछ कदम उठाए गए तो इसका विरोध खुद मुस्लिम समाज ने किया । जबकि कुरान में इस तीन तलाक़ जैसी अमानवीय प्रथा का ज़िक्र तक नहीं है क्योंकि धार्मिक सत्ताधीशों ने कुरान के इस नियम को अपने अनुसार संशोधित करके इसे प्रचारित किया । यद्यपि प्रगतिशील मुस्लिमों ने सरकार के इस कदम का समर्थन भी किया था।
परम्परावादी होने और एक सीमित दायरे में रहकर अपनी सफ़लता के सपने बुनना कोरी कल्पना मात्र है । मुस्लिम समाज में सामाजिक और राजनीतिक चेतना उतनी विकसित नहीं हो पाई जितनी होनी चाहिए थी । यही कारण है कि मुसलमानों में शोध और नवीन विचार का बोध का शून्य मात्र है । क्योंकि धार्मिक सत्ताधीशों द्वारा मुस्लिम समाज के युवाओं को सिर्फ़ धर्म की परम्परागत शिक्षा तक सीमित कर दिया गया; जिस कारण सामाजिक शिक्षा से इनका सरोकार नहीं रहा और मुसलमान पिछड़ता चला गया । इससे मौलवियों को धार्मिक सत्ता पर काबिज़ होने का अवसर तो मिला , परन्तु आम मुसलमानों को इससे कोई लाभ नहीं मिला । आधुनिक शिक्षा को प्राप्त कर मुसलमानों को जितना आगे बढ़ जाना चाहिए था अपनी परम्परागत और रूढ़िवादी शिक्षा ग्रहण करने के कारण वे अपेक्षित रुप से सही दिशा में आगे नहीं बढ़ पाए।
इसलिए आज आवश्यकता इस बात की है कि मुस्लिम समाज को धार्मिक चेतना की नहीं बल्कि उन्हें सामजिक और राजनीतिक चेतना ज़रूरत है । सदियों से मुस्लिम समाज धार्मिकता से ग्रस्त रहा है यही कारण है कि सामुदायिक विकास और सामाजिक मुद्दों से उसका कोई सरोकार नहीं रहा और वर्तमान दशा परिणाम के रूप में हमारे सामने है।
लेखक राजनीति विज्ञान विभाग, दिल्ली विश्वविधालय, नई दिल्ली में पी॰एच॰डी॰ स्कॉलर हैं।


