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Tuesday, May 26, 2026

समकालीन भारत में समान नागरिक संहिता और लैंगिक न्याय: चुनौतियाँ एवं अवरोध – बेबी तबस्सुम

आधुनिक भारतीय राष्ट्र में संविधान संस्थापकों के लिए ‘धर्मनिरपेक्षता’ और ‘सामाजिक न्याय’ की भाँति  ‘लैंगिक न्याय’ भी महत्त्वपूर्ण चिंताओं में से एक था। भारत के संविधान में ‘लैंगिक न्याय’ के साथ ‘समानता’ की अवधारणा को मौलिक अधिकारों और राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों के तहत उचित मान्यता दी गई है। प्रत्यक्ष प्रावधानों के अलावा ‘समान नागरिक संहिता’ की अवधारणा का उद्देश्य इन सिद्धांतों को प्राप्त करना है। ‘समान नागरिक संहिता’ व्यक्तिगत मामलों जैसे विवाह, तलाक, रखरखाव, दत्तक-ग्रहण, संपत्ति और उत्तराधिकार से संबंधित अधिकारों को संहिताबद्ध करने से है। यह सभी जाति, वर्ग, लिंग और धर्म के लोगों पर समान रूप से ठीक उसी प्रकार लागू होगी जिस तरह से “दंड प्रक्रिया संहिता (1973)” लागू हैं।

समकालीन परिप्रेक्ष्य में ‘मुस्लिम पर्सनल लॉ’ में सुधार सबसे अहम मुद्दों में से एक है। पारिवारिक मामलों में हिंदू समुदाय ‘हिंदू विवाह अधिनियम (1955)’, ‘हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (1956)’ और ‘हिन्दू दत्तक ग्रहण और रखरखाव अधिनियम (1956)’ वहीं ईसाई समुदाय ‘भारतीय ईसाई विवाह अधिनियम (1872)’ और ‘भारतीय विवाह-विच्छेद अधिनियम (1869)’ के द्वारा शासित है। किंतु मुस्लिम पर्सनल लॉ असंहिताबद्ध है जिसमें तलाक-ए-बिद्दत (ट्रिपल तलाक), बहुविवाह, द्विविवाह, हलाला जैसी कुप्रथाएं व्याप्त हैं। ‘निकाह हलाला’ अमानवीय, अनुचित और अन्यायपूर्ण है। इसकी संपूर्ण प्रक्रिया महिला की मानसिक शांति और बच्चों के जीवन को बर्बाद कर देती है, उसकी गरिमा को गिरा देती है और उसके पूरे परिवार को तबाह कर देती है। इसे अवैध और प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। ‘मुस्लिम लॉ’ के तहत पति को अपनी पत्नी को बिना कोई वैध कारण बताए तलाक देने की मनमानी व एकतरफा स्वतंत्रता दी जाती है। लेकिन पति या पत्नी द्वारा क्रूरता के खिलाफ उसके अधिकारों को निर्दिष्ट नहीं किया गया है। ‘मुस्लिम लॉ’ महिलाओं को इद्दत अवधि से परे रखरखाव के अधिकार से वंचित करता है जबकि CrPC की धारा-125 सभी धर्म की तलाकशुदा महिलाओं को अपने पति से रखरखाव प्राप्त करने के लिए सशक्त बनाती है।

समान नागरिक संहिता का संविधान के भाग- IV में राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों के अनुच्छेद-44 में उल्लेख किया गया। मौजूदा असमान और लैंगिक पक्षपाती ‘धार्मिक व्यक्तिगत कानून’ धर्मनिरपेक्षता, आधुनिकता और संवैधानिक मानदंडों के खिलाफ है। सभी नागरिक न केवल एक समान आपराधिक संहिता द्वारा बल्कि पर्सनल लॉ के अलावा सभी क्षेत्रों में समान नागरिक कानूनों द्वारा शासित होते हैं। आधुनिक धर्मनिरपेक्ष समाज जहां कानून का शासन कायम है, में मुस्लिम रूढ़िवादी लैंगिक न्याय और समाज में महिलाओं की स्थिति के मुद्दे पर संदिग्ध बने हुए हैं। कई मुस्लिम देशों जैसे मिस्र, मलेशिया, इंडोनेशिया, पाकिस्तान बांग्लादेश आदि ने पर्सनल लॉ को संहिताबद्ध किया है। किंतु मुस्लिम रूढ़िवादियों ने भारत में अभी तक सुधार की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया है।

नारीवादी लेखिका लोटिका सरकार भारत में लैंगिक न्याय प्राप्त करने के लिए समान नागरिक संहिता को एक साधन के रूप में स्वीकार करते हुए कहती है कि “जब तक दमनकारी पर्सनल लॉ जारी रहेंगे, तब तक महिलाओं के लिए कोई कानूनी समानता नहीं हो सकती केवल एक धर्मनिरपेक्ष समान नागरिक संहिता की स्वीकृति इसे सुनिश्चित करेगी”। संविधान सभा के सदस्य के.एम. मुंशी मुस्लिम सदस्यों के तर्कों का खंडन करते हुए कहते है कि “पर्सनल लॉ को धर्म का हिस्सा नहीं बनाया जाना चाहिए। यदि विरासत, उत्तराधिकार आदि के व्यक्तिगत कानून वास्तव में धर्म का हिस्सा है तो महिलाओं के लिए समानता आप कभी नहीं सुनिश्चित कर पाएंगे”। पारस दीवान एकीकरण के कारक को खारिज करते हुए लैंगिक न्याय और समान नागरिक संहिता के बीच सीधा संबंध देखते हैं। अन्य नारीवादी लेखिका अर्चना परासर ने समानता और लैंगिक न्याय प्राप्त करने के लिए भारत में समान नागरिक संहिता का पुरजोर समर्थन किया है। ‘महिला आंदोलनों’ द्वारा महसूस किया गया था कि महिलाओं की स्थिति में सुधार केवल समान कानूनों को लागू करके प्राप्त किया जा सकता है।

“सरला मुदगल बनाम भारतीय संघ (1995)” केस में सर्वोच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने स्वीकार किया कि समान नागरिक संहिता की अनुपस्थिति के कारण महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार नहीं मिला है और यह संविधान के अनुच्छेद-15 के प्रावधान का सीधा उल्लंघन हैं। इस केस में इस्लाम के धर्म परिवर्तन के बाद एक हिन्दू पुरुष की दूसरी शादी शून्य घोषित कर दी गई। अदालत ने इस तरह के विवाह को ‘प्राकृतिक न्याय’ के नियमों के खिलाफ पाया। अपने फैसले में अदालत ने समानता, न्याय और अच्छे विवेक (Good Conscience) का पक्ष लिया और भारत में समान नागरिक संहिता की आवश्यकता पर भी प्रकाश डाला।

वहीं “सायरा बानों बनाम भारतीय संघ (2017)” केस वादी ने तलाक-ए-बिद्दत को शून्य घोषित किए जाने की मांग की, क्योंकि ऐसा तलाक अचानक, एकतरफा और अप्रतिसंहरणीय रूप से वैवाहिक संबंधो को समाप्त करता है। अपने ऐतिहासिक फैसले में सर्वोच्च न्यायालय के पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने तलाक-ए-बिद्दत को अवैध और असंवैधानिक घोषित करते हुए देश में समान नागरिक संहिता लागू करने के द्वार भी खोल दिए हैं। किन्तु इस ऐतिहासिक, प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष फैसले बाद भी ट्रिपल तलाक के कई केस सामने आए। जिसके परिणामस्वरूप “मुस्लिम महिला (विवाह के अधिकार पर संरक्षण) बिल 2019” पारित किया गया। इस बिल में मौखिक, लिखित या इलेक्ट्रॉनिक तरीके से एकसाथ तीन तलाक देने को संज्ञेय अपराध बताते हुए पति के लिए तीन साल तक कैद का प्रावधान है। पीड़ित महिला को कोर्ट से गुहार लगाने, उचित मुआवज़ा पाने और नाबालिग बच्चों की कस्टडी लेने का प्रावधान किया गया है।

इसके साथ ही इस धर्मनिरपेक्ष कानून के क्रियान्वयन के समक्ष कई चुनौतियां खड़ी हुई है। मुस्लिम समुदाय का कहना है कि यह उनके ‘धार्मिक स्वतंत्रता’ का अतिक्रमण करता है। यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद-25, अनुच्छेद-26, और अनुच्छेद-29 में निहित मौलिक अधिकारों के खिलाफ है। अन्य विरोधियों का तर्क है कि इसके माध्यम से वर्चस्ववादी धार्मिक समूह न केवल अल्पसंख्यक पर अपितु सम्पूर्ण राष्ट्र पर हिन्दूवाद को थोपना चाहता है। इसका जिक्र राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांत में होने के कारण किसी भी न्यायालय द्वारा बाध्यकारी नहीं है। धार्मिक कानूनों को अपरिवर्तनीय मानना भी नागरिक संहिता के विरोध का कारण है। ‘भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन’ की संस्थापिका नूरजहाँ साफिया नियाज और जकिया सोमन समान नागरिक संहिता को राजनीतिक एजेंडा के रूप में बताते हुए कहती है कि संबंधित धर्म पहले से ही महिलाओं को समान सुरक्षा प्रदान करता है। इस तरह के सुधार के जरिए ट्रिपल तलाक और कम उम्र में शादी जैसी वास्तविक समस्यायों को हल किए जाने की आवश्यकता है।

इस प्रकार पुरुषों और महिलाओं के बीच भेदभाव करने वाले विभिन्न पर्सनल लॉ की निरंतरता मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है। राज्य कई बार महिलाओं के अधिकारों से समझौता करता है, जब वह धार्मिक व्यक्तिगत कानून की सुरक्षा का विकल्प चुनता है। किंतु बदलते परिवेश में धार्मिक कानून के दुष्प्रभाव को रोकने के लिए राज्य समान नागरिक संहिता लागू करने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए बाध्य है। यदि समानता की संवैधानिक गारंटी को व्यावहारिक धरातल पर उतारना है तो इसे प्राप्त करने का सबसे उपर्युक्त तरीका धर्म और व्यक्तिगत कानून के बीच के संबंध को तोड़ना है।

नारीवादी लेखिका वसुधा धगमवार का कहना है कि “न्याय समानता और भाईचारे के बिना अर्थहीन है।…इस देश के व्यक्तिगत कानूनों ने अपनी जाति, धर्म, नस्ल और लिंग के आधार पर अलग-अलग समूहों के लिए न्यायिक की अलग-अलग प्रणाली बनाकर दोनों को अलग करने का प्रयास किया है। ऐसे में भारत में ‘समान नागरिक संहिता’ कानून लैंगिक न्याय कारण बनेगा” आज़ादी के 74 वर्षों के बाद भी समान नागरिक संहिता का अभाव एक ऐसी असंगति है जिसे धर्मनिरपेक्षता, विज्ञान और आधुनिकतावाद के साथ उचित नहीं ठहराया जा सकता है। आज समानता या लैंगिक न्याय की अवधारणा किसी समाज की प्रगति का एक मानक बन गई है।

लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग में शोद्यार्थी हैं।

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