ये बात सिर्फ एक औरत की नहीं है, एक बाप की है और एक माँ की है जो अपनी ज़िंदगी खपा देती है इस आस में कल उसकी बेटी की ज़िन्दगी खुशहाल रह सके, जो अपनी बच्चियों को पालता है, बड़ा करता है लाडता है, सीने से लगाता है और फिर आँख बंद करके आपके सुपुर्द कर देता, इस आस में जैसे मैं उसकी छोटी, बड़ी गलतियों पे उसे माफ़ कर दिया करता हूँ शायद आप भी कर दें, पूरी ज़िन्दगी लगाता है वोह.
हर बाप लखपति नहीं होता, वोह खुद्दार भी होता है जो किसी के सामने अपनी गरीबी नहीं दिखाता, वोह मज़दूर भी होता है, वोह मज़दूरी करता है, अपना पेट काटता है और फिर एक एक पाई जमा करता है और अपनी औकात से ज्यादा अपनी बेटी के लिए कर डालता है उसी आस में के मेरी औलाद हमेशा खुश हे.
वोह बाप अपनी पूरी ज़िन्दगी लगा देता है अपनी बेटी के एक नए रिश्ते को बनाने के लिए और वोह माँ भी, 10-10 रूपये जोड़कर अपने खुद के जिस्म पर गंदे लिबास को पहनती है और अपनी बेटी को बेहतर से बेहतर पहनाती है, ताकि उसे कोई पसंद कर सके.
50 देखने वाले आते हैं, वोह माँ अपनी तमाम जान झोंककर हर बार एक आस में परदे और दरवाज़े के पीछे सुना करती है शायद अब उसकी बेटी का बेहतर रिश्ता हो जाए, आपको मज़ाक लगता है ये सब, कभी सोचा है उस माँ पे बार बार क्या बीतती है, और तब जाकर एक रिश्ता होता है, और आपको दो मिनट भी नहीं लगता उस रिश्ते को तोड़ने के लिए.
आपने अपनी कौम की लड़कियों को न इतना पढ़ने दिया और न हीं इतनी आज़ादी दी तो वोह लड़की कहाँ जाती? क्या करती? न हर लड़की का बाप इतना सक्षम होता है.
जिस ग़रीब मुसलमान बाप के पास बेटी की शादी के बाद एक फूटी कौड़ी भी नहीं बची, जो अपने बुढ़ापे को थोड़े से जमा पूँजी के साथ सुकून से गुज़ारना चाहता था उसका क्या? कैसे जीता वोह, कैसे अपनी तलाकशुदा बेटी को पालेगा? और कब तक पालेगा.
कौन करता है शादी तलाकशुदा से? सच बताऊँ अक्सर नतीजा क्या होता है? एक नेक लड़की को आप मजबूर कर देते हैं के वोह अपने जिस्म को बेच कर अपनी ज़िन्दगी पूरी करें.
और वोह बाप और माँ मरतें भी नहीं है जल्दी से, बल्कि जीती है और खुदा भी उन्हें लम्बी उम्र देता है ताकि देखती रहें अपने जिगर के टुकड़े को तार तार होते हुए, तमाशा बना दिया था आपने उस लड़की के पूरे घर का।
ठीक है आप झुठला सकते हैं इस हकीकत को पर मैं नहीं झुठलाने वाला.
मैं बिलकुल नहीं कहता के तलाक को खत्म कर दिया जाये, नहीं, मगर ज़रुरत पड़ने पर, जब तमाम इन्तहा पहुँच जाए, जब हर तरह से बात करके मना लिया जाए और फिर भी बात न बने, तो अलग होना चाहिए, किसी ने नही रोका आपको और यह भी शरीयत है और बेहतर शरीयत है इसका इस्तेमाल करना आप कब सीखेंगे?
आपने कभी पर्सनल लॉ बोर्ड से पूछा उन बच्चियों के लिये आजतक किया क्या? उन तमाम लोगो से पूछिए जिनपर आपने पूरी कौम की ज़िम्मेदारी दे रखी है क्या ऐसी कोई, स्कीम या फण्ड या कानून बनाया था जो तलाक शुदा औरत को राहत दे सके, जो तीन तलाक़ को रोकने की किसी मुहिम का हिस्सा बन सके हों?
जब आप अपनी नालाइकियों के चरम पर पहुंचेंने की पूरी कोशिश इस्लाम की आड़ में करेंगे तब ऐसे फैसलों की ज़रुरत पड़ेगी. और हाँ हमारी शरीयत पर न किसी ने आँख उठाई है न किसी को इतनी फुर्सत है शायद ये ऐसा शिकंजा है जो आपको सही इस्लाम की समझ दे सके.
और अगर आपको लगता था कुछ फेरबदल की ज़रूरत थी इस क़ानून पर, तो संवाद करते लेकिन नहीं कर पाए, आपने तो कुतर्क चालू कर दिया और आपके सबसे पढ़े लिखे नेता संसद में और संसद के बाहर सिर्फ जाहिलो के तरह बयानबाज़ी ही करते रह गए, बात से कौनसा मसला हल नहीं होता? मगर आपने तो करना ही नहीं था आपने तो पुरानी मौजूद कुरूतियों पे ही तंज़ करना था आप हिस्का करते रहे.
खैर मैं इसे बेहतर और समाज को नई दिशा देने वाला नतीजा मानता हूँ |
लेखक रामजस कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में सहायक प्रोफेसर हैं।


